लोक प्रशासन से आप क्या समझते हैं इसके क्षेत्र की विवेचना कीजिए?
                                                अथवा 
लोक प्रशासन के अध्ययन के प्रमुख उपागम कौन कौन से हैं?

     
उत्तर :-
लोक प्रशासन

  लोक प्रशासन दो शब्दों से मिलकर बना है "लोक" एवम् "प्रशासन"। लोक प्रशासन के अर्थ को समझने से पूर्व हमको प्रशासन का अर्थ समझना पड़ेगा।

प्रशासन दो शब्दों "प्र" और "शासन" से बना हैँ। "प्र " का अर्थ है "उत्कृष्ट" और "शासन" का अर्थ है "कार्यो का प्रबन्धन"। इस प्रकार प्रशासन का अर्थ है "उत्कृष्ट तरीके द्वारा कार्यो का प्रबन्धन"।

गुलिक के अनुसार :- 

सुपरिभाषित उद्देश्यों की पूर्ति को उपलब्ध कराने को प्रशासन कहा है।

लोक प्रशासन में "लोक" 

का अर्थ "सरकार" है इस प्रकार लोक प्रशासन का अर्थ है "उत्कृष्ट तरीके से शासकीय कार्यो का प्रबन्धन" ।

व्हाइट के शब्दों में, लोक प्रशासन में 

 वे गतिविधियाँ आती हैं जिनका प्रयोजन सार्वजनिक नीति को पूरा करना अथवा क्रियान्वित करना होता है।

प्रशासन एवम् लोक प्रशासन में अंतर :-

       लोक प्रशासन' के अर्थ को भली-भांति समझने के लिए प्रशासनऔर लोक प्रशासनमें विभेद समझना आवश्यक हैः

1.प्रशासन एक सामान्य शब्दावली है जिसका परिप्रेक्ष्य व्यापक है। लोक प्रशासन का परिप्रेक्ष्य संकुचित है, क्योंकि यह सार्वजनिक नीतियों से ही सम्बन्धित है।

2.प्रशासन का सम्बन्ध कार्यों को सम्पन्न कराने से है जिससे कि निर्धारित लक्ष्य पूरे हो सकें। लोक प्रशासन दोहरे स्वरूप वाला है। यह अध्ययन, अध्यापन एवं अनुसंधान का शैक्षणिक विषय होने के साथ-साथ क्रियाशील विज्ञान भी है।

3.आमतौर से प्रशासन एक क्रिया (activity) भी है और प्रक्रिया (process) भी है। लोक प्रशासन का सम्बन्ध सार्वजनिक नीति के निर्माण, क्रियान्वयन से है। यह नीति विज्ञान और प्रक्रिया होती है।

4.प्रशासन एक सार्वलौकित क्रिया है जिसे समस्त प्रकार के समूह प्रयत्नों में देखा जा सकता है, चाहे वह समूह परिवार, राज्य या अन्य सामाजिक संघ हो। लोक प्रशासन का सम्बन्ध विशिष्ट रूप से सरकारी क्रियाकलापों से है। इसके अन्तर्गत वे सभी प्रशासन आ सकते हैं जिनका जनता पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है।

5.प्रशासन उन समस्त सामूहिक क्रियाओं का नाम है जो सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सहयोगात्मक रूप में प्रस्तुत की जाती है। लोक प्रशासन सरकार के कार्य का वह भाग है जिसके द्वारा सरकार के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की प्राप्ति होती है।

6.प्रशासन एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए सहयोगी ढंग से किया जाने वाला कार्य है। लोक प्रशासन ऐसे उद्देश्यों का क्रियान्वयन है, जिन्हें जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों ने निर्धारित किया है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति लोक सेवाओं द्वारा सहयोगी ढंग से की जाती है।

प्रशासन के अन्तर्गत लोक प्रशासन और निजी प्रशासन दोनों समाविष्ट हैं। लोक प्रशासन का सम्बन्ध सार्वजनिक’ (जनता से सम्बन्धित) प्रशासन से है।

लोक प्रशासन की प्रकृति :-

    लोक प्रशासन की प्रकृति के विषय में दो तरह के दृष्टिकोण हैं। प्रथम, व्यापक दृष्टिकोण जिसे 'पूर्ण विचार' अथवा 'एकीकृत विचार' कहा जाता है और दूसरा संकुचित दृष्टिकोण जिसे 'प्रबन्धकीय विचार' कहा जाता है।

एकीकृत विचार :-

इस विचार के समर्थकों के मतानुसार, लोक प्रशासन लोकनीति को लागू करने और उस की पूर्ति के लिए प्रयोग की गई गतिविधियों का योग है। चाहे वे क्रियाएं, प्रबन्धकीय अथवा तकनीकी ही क्यों न हो। विस्तृत रूप से सरकार की सभी गतिविधियाँ चाहे वे कार्यपालिका, विधायिका अथवा न्यायपालिका से सम्बंधित हो, लोक प्रशासन में शामिल हैं।

✒एल.डी. ह्नाइट, विलसन, डीमाक और फिफनर आदि लेखकों ने इस विचार का समर्थन किया है।

इस दृष्टिकोण को अपनाते हुए फिफनर (Pfiffner) ने कहा है

    लोक प्रशासन का अर्थ है सरकार का काम करना चाहे वह कार्य स्वास्थ्य प्रयोगशाला में एक्सरे मशीन का संचालन हो अथवा टकसाल में सिक्के बनाना हो। लोक प्रशासन से तात्पर्य है लोगों के प्रयासों में समन्वय स्थापित करके कार्य को सम्पन्न करना ताकि वे मिलकर कार्य कर सकें अथवा अपने निश्चित कार्यों को पूरा कर सके।

प्रबन्धकीय विचार:-

इस विचार के समर्थक लोक प्रशासन को केवल कार्यपालिका शाखा की गतिविधियों तक ही सीमित मानते है।

✒साइमन, स्मिथबर्ग तथा थॉमसन इस दृष्टिकोण के समर्थक हैं।

गुलिक के अनुसार 

 प्रशासन का सम्बन्ध कार्य पूरा किये जाने और निर्धारित उद्देश्यों की परिपूर्ति से है।

इन दोनों विचारों में से किसी की भी पूर्णतः उपेक्षा नहीं की जा सकती। प्रशासन का ठीक अर्थ तो उस प्रसंग पर निर्भर करता है जिस संदर्भ में शब्द का प्रयोग किया जाता है।

लोक प्रशासन के प्रकृति के सन्दर्भ में प्रबन्धकीय और एकीकृत दृष्टिकोण में अंतर स्पष्ट कीजिये ?

  इन दोनों विचारों में कई पहलुओं से भिन्नता पाई जाती है। एकीकृत विचार में प्रशासन से सम्बन्धित सभी व्यक्तियों के कार्य शामिल हैं, जबकि प्रबन्धकीय विचार प्रशासन को केवल कुछ एक ऊपर के व्यक्तियों के कार्यों तक ही सीमित करता है। दूसरे शब्दों में एकीकृत दृष्टिकोण में प्रबन्धकीय, तकनीकी तथा गैर-तकनीकी सब प्रकार की गतिविधियां शामिल हैं जब कि प्रबन्धकीय दृष्टिकोण अपने आप को एक संगठन के प्रबन्धकीय कार्यों तक ही सीमित रखता है। एकीकृत दृष्टिकोण के अनुसार लोक प्रशासन सरकार की तीनों शाखाओं-कार्यपालिका, विधानपालिका तथा न्यायपालिका से सम्बन्धित है। परन्तु प्रबन्धकीय दृष्टिकोण के अनुसार लोक प्रशासन का संबंध केवल कार्यपालिका कार्यों से है। इन दोनों विचारों में से किसी की भी पूर्णतः उपेक्षा नहीं की जा सकती। प्रशासन का ठीक अर्थ तो उस प्रसंग पर निर्भर करता है जिस संदर्भ में शब्द का प्रयोग किया जाता है।

लोक प्रशासन का कार्यक्षेत्र :-

 लोक प्रशासन के क्षेत्र संबंधी विचार को दो भागों में बांटा जा सकता है-

(१) एक वर्ग के विचारक लोक प्रशासन की व्याख्या इतने व्यापक अर्थ में करते हैं कि लोक प्रशासन की सीमा के अन्दर सरकार के सभी विभाग तथा कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका के क्षेत्र आ जाते हैं। इस परिभाषा को स्वीकार करने पर प्रशासन के क्षेत्र में वे सभी कार्य शामिल होंगे जो सरकार की सम्पूर्ण सार्वजनिक नीतियों को निर्धारित करने तथा उन नीतियों को कार्यान्वित करने के लिए किए जाते हैं परन्तु इस परिभाषा में लोक प्रशासन की अपनी 'विशिष्टता' नहीं रह जाएगी।

(२) लोक प्रशासन के संबंध में दूसरे विचार के अन्तर्गत लोक प्रशासन का अध्ययन कार्यपालिका के उस पक्ष से संबंधित है जो व्यवस्थापिका के द्वारा निश्चित की गई नीतियों का व्यवहार में लाने का उत्तरदायित्व ग्रहण करता है। इसलिए लोक प्रशासन कार्यपालिका से ही संबंधित है और उसी के नेतृत्व में काम करता है। एफ मार्क्स के अनुसार लोक प्रशासन के अन्तर्गत वे समस्त विषय आते हैं जिनका संबंध सार्वजनिक नीति से है, स्थायी परम्पराओं के अनुसार, लोक प्रशासन के कार्य असैनिक संगठन, कर्मचारियों एवं प्रक्रियाओं से लगाये जाते हैं, जो प्रशासन को प्रभावशाली बनाने के लिए कार्यपालिका को दिए जाते हैं।

विलोबी के अनुसार, लोक प्रशासन के क्षेत्र का संबंध इन बातों से है-

(१) सामान्य प्रशासन,

(२) संगठन,

(३) कर्मचारी वर्ग,

(४) सामग्री, तथा

(५) वित्त

    लोक प्रशासन के अध्ययन-क्षेत्र के बारे में विचारकों में बड़ा भेद है। मूलतः मतभेद इन प्रश्नों को लेकर है कि क्या लोक प्रशासन शासकीय कामकाज का केवल प्रबन्धकीय अंश है अथवा सरकार के समस्त अंगों का समग्र अध्ययन? क्या लोक प्रशासन सरकारी नीतियों का क्रियान्वयन है अथवा यह नीति-निर्धारण में भी प्रभावी भूमिका अदा करता है।

 लोक प्रशासन का महत्व :-

    मानव एक सामाजिक प्राणी है। वह सदैव समाज में रहता है। प्रत्येक समाज को बनाये रखने के लिए कोई न कोई राजनीतिक व्यवस्था अवश्य होती है इसलिये यह माना जा सकता है कि उसके लिये समाज तथा राजनीतिक व्यवस्था अनादि काल से अनिवार्य रही है। 

अरस्तू ने कहा है कि... 

   यदि कोई मनुष्य ऐसा है, जो समाज में न रह सकता हो, या जिसे समाज की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह अपने आप में पूर्ण है, तो वह अवश्य ही एक जंगली जानवर या देवता होगा।” 

     प्रत्येक समाज में व्यवस्था बनाये रखने के लिये कोई न कोई निकाय या संस्था होती है, चाहे उसे नगर-राज्य कहें अथवा राष्ट्र-राज्य। राज्य, सरकार और प्रशासन के माध्यम से कार्य करता है। राज्य के उद्देश्य और नीतियाँ कितनी भी प्रभावशाली, आकर्षक और उपयोगी क्यों नहों, उनसे उस समय तक कोई लाभ नहीं हो सकता, जब तक कि उनको प्रशासन के द्वारा कार्य रूप में परिणत नहीं किया जाये। इसलिये प्रशासन के संगठन, व्यवहार और प्रक्रियाओं का अध्ययन करना आवश्यक हो जाता है।

डॉनहम ने विश्वासपूर्वक बताया कि 

यदि हमारी सभ्यता असफल होगी तो यह मुख्यतः प्रशासन की असफलता के कारण होगा।

ज्यों-ज्यों राज्य के स्वरूप और गतिविधियों का विस्तार होता गया है, त्यों-त्यों प्रशासन का महत्त्व बढ़ता गया है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि हम प्रशासन की गोद में पैदा होते हैं, पलते है, बड़े होते हैं, मित्रता करते, एवं टकराते हैं और मर जाते हैं। आज की बढ़ती हुई जटिलताओं का सामना करने में, व्यक्ति एवं समुदाय, अपनी सीमित क्षमताओं और साधनों के कारण, स्वयं को असमर्थ पाते हैं। चाहे अकाल, बाढ़, युद्ध या किसी रोग की रोकथाम करने की समस्या हो अथवा अज्ञान, शोषण, असमानता या भ्रष्टाचार को मिटानेका प्रश्न हो, प्रशासन की सहायता के बिना अधिक कुछ नहीं किया जा सकता। स्थिति यह है कि प्रशासन के अभाव में हमारा अपना जीवन, मृत्यु के समान भयावह और टूटे तारे के समान असहाय लगता है। हम उसे अपने वर्तमान का ही सहारा नहीं समझते, वरन् एक नयी सभ्यता, संस्कृति, व्यवस्था और विश्व के निर्माण का आधार मानते हैं। हमें अपना भविष्य प्रशासन के हाथों में सौंप देने में अधिक संकोच नहीं होता।

चार्ल्सबियर्ड ने कहा है कि 

  कोई भी विषय इतना अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि प्रशासन है। राज्य एवं सरकार का, यहाँ तक कि, स्वयं सभ्यता का भविष्य, सभ्य समाज के कार्यों का निष्पादन करने में सक्षम प्रशासन के विज्ञान, दर्शन और कला के विकास करने की हमारी योग्यता पर निर्भर है।

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