प्रश्न :-  

    नव लोक प्रबंधन (New public Management) पर एक विवेचनात्मक निबन्ध लिखिए | 
                                       या 
   नवीं अथवा नूतन (नये) लोक प्रबंध की अवधारणा का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसकी विशेषताओं एवं घटकों पर प्रकाश डालिए |

उत्तर :- 

        राजनीतिशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषय के अंतर्गत अपने अभ्युदय से लेकर आज तक तीन विषयों का जन्म हुआ जिनमें तुलनात्मक राजनीति , अंतर्राष्ट्रीय राजनीति (सम्बन्ध ) एवं लोक प्रशासन | तीनों विषय अपने विकास के पथ पर अग्रसर है | यहाँ पर हम लोक प्रशासन के विकास यात्रा का वर्णन कर रहे है | लोक प्रशासन एक ऐसा विषय है जो अपने विकास की दिशा में नये आयाम गढ़ता जा रहा है चाहे वह 'नव लोक प्रशासन ' हो या 'नव लोक प्रबंधन' यहाँ पर हम नवीन लोक प्रबंधन की अवधारणा का विवेचन कर रहे है | 
NEW PUBLIC MANAGEMENT

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           लोक प्रशासन के क्षेत्र में व्यवहार के धरातल पर 80 एवं 90 के दशक में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए है तथा पश्चात्ती देशो की सरकारों ने अपने अपना अनुकूलन नूतन प्रौद्योगिकी,नूतन सामाजिक माँग तथा  प्रतिस्पर्धा के अनुसार किया है | इससे एक नये किस्म के लोक प्रशासन की आवश्यकता पैदा हुई जिसे हम नव लोक प्रबंधन (new publice Management) के नाम से जानते है | इस प्रबंधन सम्बन्धी दृष्टिकोण को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है जैसे 'प्रबंधनवाद (Managerilism) नव लोक प्रबंधन (New Publice Management ) बाजार आधारित सार्वजानिक प्रशासन ( Marker based Public Administration) उद्यमी सरकार (Emterpreneurial  Government ) आदि नाम विशेष उल्लेखनीय है | 
    लोक प्रबंध की अवधारणा कोई एक डीएम से नूतन अवधारणा नही है , पिछले तीन दशकों से हम इस अवधारणा पर चर्चा करते आ रहे है | गार्सन एवं आवरमैंन  ने लोक प्रबंधन को परिभाषित केते हुए लिखा है -

    लोक प्रबंधन कोई वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं है और न ही प्रशासनिक विज्ञान है फिर भी यह दोनों से अत्यधिक प्रभावित दिखायी देता है | 

जेन एरिक लेन के अनुसार --

  निजी क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाली प्रबंधकीय तकनीकों को सार्जनिक क्षेत्र में लागू करना ही नव अथवा नूतन लोक प्रबंधन है | नव लोक प्रबंधन का जोर प्रबंधन पर है , कार्य निष्पादन पर है , दक्षता पर है न कि नीति पर | नव लोक प्रबंधन कुशलता मितव्ययिता तथा प्रभावशीलता को हासिल करने पर जोर देता है | 
       नव लोक प्रबन्धन लोक विकल्प विचारधारा एवं प्रबन्धनवाद पर निर्भर है | यह बाजार और निजी क्षेत्र प्रबंधन के महत्व पर आधारित अवधारणा है | यह लोक प्रशासन में प्रतिस्पर्धात्मक तत्व का समावेश करता है | यह राज्य पर बाजार के वर्चस्व को अंगीकार करता है | इसके अनुसार सार्जनिक अधिकारी तंत्र के सुकुड़ने से जो खाली जगह बनेगी उसे बाजार द्वारा भरा जाना है | यह वेवर के नौकरशाही प्रतिमान की आलोचक है , बाजार मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध है तथा एकाधिकारों का प्रबल विरोधी हैं | यह वाणिज्य विधियों एवं तकनीकों का लोक प्रशासन में प्रयोग पर जोर देता है | 
इसके प्रमुख लक्षण है : 
1.व्यापार समान प्रबन्ध 
2.सेवा एवं ग्राहक उन्मुखिकरण 
3.बाजार जैसी प्रतिस्पर्धा 
     नव लोक प्रबंधन शब्द को 1991 में क्रिस्टोफर हुड ने गढ़ा था | आज इस विचारधारा से सम्बंधित विद्वानों में गेराल्ड काइडन , पी.हौगेट , सी.पौलिट , आर.एम.कैली तथा एल.टेरी के नाम विशेष उल्लेखनीय है | 

                        नव लोक प्रबंधन की विशेषताएँ 

 नव लोक प्रबंधन की प्रमुख्य विशेषताओं को निम्न बिन्दुओं के आधार पर विवेचित किया जा सकता है | 
1. नीति के बजाय प्रबन्धन  विष्पादन मुल्यांकन और कार्यकुशलता पर ध्यान केन्द्रित रखना है |
2. अर्द्ध बाजारों का प्रयोग और ठेके द्वारा प्रतिस्पर्धा को प्रोत्सहन |
3.लागत व्यय को कम करके लोक प्रशासन को मितव्ययी बनाना |
4.प्रबंधन की ऐसी व्यवस्था जिसमें निर्गत लक्ष्यों , अल्पकालिक ठेके , आर्थिक प्रोत्साहन और प्रबन्ध सम्बन्धी स्वायत्तता पाई जाती है | 
            ओसबोर्न और गैबलर ने अपनी पुस्तक "Reinvesting Government" में ' व्यवसायी शासन ' के लिए दस सूत्री योजना प्रस्तुत की है |
1. व्यवसायी शासन , सेवाओं और वस्तुओं के प्रदाताओं के बीच प्रतियोगिता को बढ़ावा देता है |
2. नौकरशाही की नियंत्रण - शक्ति को कम करके यह  नागरिकों को अधिकारिता प्रदान करता है |
3. ऐसा शासन अपनी एजेंसियों के कार्यों का मूल्यंकन मूलतः उनके उत्पादों के आधार पर करता है , आदानों के आधार पर नही | 
4. ऐसी एजेंसियां अपने मिशन से उत्प्रेरित होती है , नियमों और कानूनों से नही | 
5. ये एजेंसिया अपने अभिग्राहकों को खरीददारी समझती है और उनक्जे लिए अनेकानेक विकल्प प्रस्तुत करती है | 
6. समस्या उत्पन्न होने पर उनका निदान नही किया जाता है | बल्कि समस्या को उत्पन्न ही नही होने दिया जाता है |
7. ये संस्थाएं अपनी शक्ति धन कमाने में लगाती है न कि धन का व्यय करने में |
8. प्रतिभागिता पर आधारित प्रतिबंधन को अपनाकर ये संस्थाएँ प्राधिकारों का विकेंद्रीण करती है |
9. नौकरशाही मूलक प्रशासनिक तंत्र की जगह व्यवसायी सरकारें बाजार आधारित तंत्र की वरीयता देती है |
10. सामुदायिक समस्याओं के समाधान हेतु व्यवसायी सरकारें निजी - सार्वजानिक स्वयंसेवी सभी तरह के क्षेत्रों को उत्प्रेरित करती है और इनका जोर मात्र सार्वजानिक सेवाओं को प्रदान कर देने पर ही नही लगा रहता है |


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